राष्ट्रपति पदक से सम्मानित काशी राम बडोनी का गोलोक गमन, 36 वर्षों तक देश सेवा के साथ समाज और गांव की एकजुटता के लिए रहे समर्पित

देहरादून। राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित पूर्व सैनिक एवं समाजसेवी सूबेदार काशी राम बडोनी का गोलोक गमन हो गया हैं.उन्होंने 36 वर्षों तक देश की सेवा करते हुए सैन्य जीवन में अनेक पुरस्कार और सम्मान प्राप्त किए.सेवा से निवृत्ति के बाद भी उनका जीवन समाज, गांव और राष्ट्रहित के कार्यों के लिए समर्पित रहा.उनके निधन से परिवार, पूर्व सैनिक समाज, पत्रकारिता जगत और उत्तराखंड के सामाजिक क्षेत्र में शोक की लहर है।
मूल रूप से टिहरी गढ़वाल जनपद के हिडोलाखाल ब्लॉक के सिलौड़ गांव निवासी काशी राम बडोनी ने अपने जीवन में देशसेवा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी. सैन्य सेवा के दौरान उनके उत्कृष्ट योगदान को देखते हुए उन्हें राष्ट्रपति पुरस्कार सहित कई सम्मान प्राप्त हुए.करीब 36 वर्षों तक देश की सेवा करने के बाद भी उनके भीतर समाज और अपनी मातृभूमि के प्रति समर्पण लगातार बना रहा।
काशी राम बडोनी वरिष्ठ पत्रकार हिमांशु बडोनी के पिता थे.सामाजिक सरोकारों से उनका गहरा जुड़ाव रहा.वह सामाजिक कार्यों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते थे और गांवों की एकजुटता को हमेशा समाज की सबसे बड़ी ताकत मानते थे.उनका मानना था कि पहाड़ों की खुशहाली के लिए गांवों को केवल याद करना नहीं, बल्कि उन्हें फिर से आबाद करने के लिए सामूहिक प्रयास करना जरूरी है.
वह श्री कृष्ण नगेला समिति के अध्यक्ष भी रहे. समिति और सामाजिक गतिविधियों के माध्यम से उन्होंने लोगों को जोड़ने, गांव की समस्याओं पर सामूहिक रूप से आवाज उठाने और आपसी भाईचारे को मजबूत करने का प्रयास किया.गांव की मिट्टी और अपनी जड़ों से उनका लगाव जीवन के अंतिम समय तक बना रहा.

बीमारी के बाद अपने देहरादून स्थित आवास पर ली अंतिम सांस

पिछले करीब एक माह से काशी राम बडोनी अस्वस्थ चल रहे थे. उनका उपचार जॉली ग्रांट अस्पताल में चल रहा था.19 अगस्त को अस्पताल से डिस्चार्ज होने के बाद वह देहरादून स्थित अपने आवास पहुंचे, जहां उसी दिन करीब दोपहर 2:30 बजे उन्होंने अंतिम सांस ली.
उनके निधन की खबर मिलते ही परिवार, रिश्तेदारों, पूर्व सैनिकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, पत्रकारों और राजनीतिक क्षेत्र से जुड़े लोगों में शोक की लहर दौड़ गई.

तिरंगे में लिपटकर दी गई अंतिम विदाई

20 अगस्त को पूरे सैन्य सम्मान के साथ तिरंगे में लिपटे उनके पार्थिव शरीर को हरिद्वार के खड़खड़ी श्मशान घाट ले जाया गया जहां अंतिम दर्शन और श्रद्धांजलि देने के लिए सैकड़ों लोग पहुंचे थे.हरिद्वार खड़खड़ी श्मशान घाट में सैकड़ो लोगों ने नम आंखों से देश के इस जांबाज सपूत और समाजसेवी को अंतिम विदाई दी.
काशी राम बडोनी का जीवन इस बात की मिसाल रहा कि देश की सेवा केवल वर्दी में रहते हुए ही नहीं, बल्कि सेवानिवृत्ति के बाद समाज और अपनी जड़ों के लिए किए गए कार्यों से भी की जा सकती है. उन्होंने सैन्य जीवन में राष्ट्र की रक्षा का दायित्व निभाया और बाद के जीवन में गांव, समाज और सामाजिक एकजुटता को मजबूत करने का प्रयास किया।

राजनीतिक, प्रशासनिक और सामाजिक क्षेत्र में शोक

काशी राम बडोनी के निधन पर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी, विधानसभा अध्यक्ष ऋतु खंडूड़ी भूषण, श्री बदरी-केदार मंदिर समिति के अध्यक्ष हेमंत द्विवेदी, गढ़वाल सांसद अनिल बलूनी, कैबिनेट मंत्री सतपाल महाराज,राज्य महिला आयोग की अध्यक्ष कुसुम कंडवाल, राज्य गौसेवा आयोग के अध्यक्ष राजेंद्र अंथवाल,कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल,भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट,पूर्व कैबिनेट मंत्री मंत्री प्रसाद नैथानी, पूर्व मंत्री सुरेंद्र सिंह नेगी,पूर्व राज्य सभा सांसद प्रदीप टमटा,उत्तराखंड के पूर्व सूचना आयुक्त राजेंद्र कोटियाल, उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारी सम्मान परिषद के पूर्व अध्यक्ष धीरेन्द्र प्रताप, उत्तराखंड क्रांति दल के वरिष्ठ नेता महेंद्र सिंह रावत, यूकेडी के केंद्रीय संरक्षक डॉ. शक्ति शैल कपरवान, पूर्व सैनिक संघर्ष समिति के अध्यक्ष महेंद्र पाल सिंह रावत, पूर्व डीजीपी अभिनव कुमार, गढ़वाल आईजी राजीव स्वरूप, आईजी अरुण मोहन जोशी, कुमाऊं आईजी निवेदिता कुकरेती, सीआईडी एसपी प्रदीप राय,डीआईजी मेरठ जोन कलानिधि नैथानी तथा गढ़वाल मंडल के संभागीय खाद्य नियंत्रक गिरीश गुणवंत सहित अनेक लोगों ने गहरा दुख व्यक्त किया.
राज्य आंदोलनकारियों, पूर्व सैनिकों, पत्रकारिता जगत, सामाजिक संगठनों और समाजसेवा से जुड़े सैकड़ों लोगों ने भी उनके निधन पर शोक जताते हुए कहा कि काशी राम बडोनी ज़ी का जाना समाज के लिए अपूरणीय क्षति है.

देश और समाज सेवा की विरासत छोड़ गए काशी राम बडोनी

काशी राम बडोनी ज़ी भले ही आज इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन देश की 36 वर्षों की सेवा, सैन्य सम्मान, सामाजिक सरोकार और अपनी मातृभूमि के प्रति उनका गहरा लगाव उन्हें हमेशा लोगों की स्मृतियों में जीवित रखेगा.
उन्होंने अपने जीवन से यह संदेश दिया कि देशसेवा केवल सीमा पर खड़े होकर ही नहीं, बल्कि समाज को जोड़ने, गांवों को बचाने और आने वाली पीढ़ियों को अपनी जड़ों से जोड़ने से भी होती है.
उनकी सबसे बड़ी विरासत यही है कि उन्होंने जीवनभर देश, समाज और गांव की एकजुटता को प्राथमिकता दी.उनके निधन से एक समर्पित सैनिक ही नहीं, बल्कि समाज और अपनी मिट्टी से गहरा प्रेम करने वाला एक संवेदनशील व्यक्तित्व भी विदा हो गया।

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