अब आयुष्मान योजना के बीमारों को भी ठेंगा ?
देहरादून: आयुष्मान योजना बीमार इलाज मिलने के कारण दर-दर भटकने को मजबूर है। अस्पतालों ने ऐसे मरीजों की भर्ती को खड़े कर दिये है? दूसरी ओर सरकार ढोल पीट रही है कि आयुष्मान योजना से लाखों मरीजों को राहत दी गयी। इन खोखले दावों के राज्य तीमारदार दर-दर भटकाने को विवश है।
उत्तराखण्ड में स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली किसी से छिपी नही है। सुदूर पहाड़ों में अस्पताल बीमार की हालत में है वहाँ ना तो जरूरी उपकरण (संसाधन) है और न ही काबिल स्टॉफ। कुमाऊं मेंचौखुरिया और गढ़वाल में पिलखी एवं प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र बदहाली को लेखा व जन आन्दोलन इसका प्रमाण है? जहाँ आन्दोलनकारियों ने पैदल सरूड नाप का देहरादून मुख्यमंत्री और राज्यपाल के सरकारी आवास तक धरना तोडने का ध्यान खींचा लेकिन हासिल पाया ‘सिफर’ वाली स्थिति है वह भी इस चुनावी साल में स्वास्थ्य जैसी सियासी सुविधा पर सरकार की इस अनदेखी पर समय-समय पर विपक्ष भी सवाल खड़े कर चुका है। विधानसभा से लेकर सड़क तक की इस लडाई के बावजूद स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली किसी से छुपी नही है। महानगरों में डॉक्टर सरकारी सुविधा सेवा लाभ उठाने के साथ ही निजी अस्पतालों में प्रैक्टिस कर रहे है, यहाँ तक कि खुले आम उनका प्रचार भी करते है शिकायत के बावजूद दिये चेतावनी का हवाला देकर वह बेखौफ अपना काम कर रहे है।
स्वास्थ्य महकमे के मंत्री धन सिंह रावत का बयान कि 17 लाख को हम आयुष्मान योजना के तहत लाभान्वित कर चुके है इसमें 4 लाख को कैशलेस उपचार और एक लाख 73 हजार लाभार्थी ओपीडी और दो लाख 91 हजार ओपीडी कैशलेस की सुविधा ली। जबकि निजी अस्पतालों के प्रबन्धक ने सरकार पर कई सौ करोड की देनदारी की गुहार लगाते हुए आगे आयुष्मान योजना के अन्र्तगत बीमारों को भर्ती न करने का अल्टीमेटम दे दिया है उनका कहना है कि अपने संसाधनों से वह कब तक पैसा फूंकते रहेंगे और सरकारी अधिकारियों से अपना पैसा मंगाने के लिए कमीशन खोरी के लिए विवश होंगे ?
इन सब हालात से यह समझा जा सकता है कि आयुष्मान योजना के इलाज में जिन निजी अस्पतालों में अपने खर्च पर बीमारों को उपचार दिया अब वह पिछले कई साल से उस पैसे के एि सरकारी अधिकारियों और स्वास्थ्य मंत्रालय के यहाँ अपने पैसों के लिए भटक रहे है। करोड़ों की देनदारी से सरकारी तंत्र कुम्भकरणी नींद की तरह सोये बैठा है लेकिन उनका भुगतान कब होगा इस पर कोई जवाब नही दिया जा रहा है। सूत्रों का कहना है कि एक नामी मेडिकल कॉलेज के लगभग 135 करोड़ रूपये बकाया है जिन्हें देने के लिए कोइ समय सीमा निश्चित नही की जा रही है और इस पर उक्त संस्थान से स्वास्थ्य मंत्रालय को अल्टीमेटम दे दिया गया है कि अब तब तक आयुष्मान के मरीजों को हम अपने यहाँ भर्ती नहीं करेंगे जब तक पिछला भुगतान नही किया जाए इससे समझा जा सकता है कि राज्य में स्वास्थ्य सेवायें किस तरह से चल रही है?
डबल इंजन का 10 साल का सरकारी तंत्र आयुष्मान योजना के बीमारों को ही अधर में नही छोड़ रहा बल्कि ओर जगह भी इसी तरह के हालत है। कृषि विभाग की योजनाओं में भी जमकर भ्रष्टाचार हुआ है। किसान कई बाद आन्दोलन कर चुके है। उद्यान विभाग में करोड़ो के घोटाले पर पर्दा पड़ा हुआ है। शिक्षा-स्वास्थ्य और कृषि जैसी आम जनता के जुड़े महकमे लगातार सवालों के घेरे में रहे है और इस सबके जवाब देते सरकार से बन नही रहा है। लगतार जनान्दोलन के कारण सुनवाई न होने के बाद आम जन मानस खुद को ठगा हुआ महसूस करता है।